36 साल में भी बरकरार है छोले कुल्चे का वही स्वाद

पिज्जा के शौकीन आज के बच्चे शायद इस स्वाद को न समझें, लेकिन 90 के दशक के बड़े बच्चे छोले कुल्चे खाने आज भी यहाँ आते हैं।

मेरा नाम “हेतराम” है पैदाइश मुरादाबाद की है और मैं उत्तराखण्डी हूं। वर्ष 1984 में अपने पिता और चाचा के साथ यहाँ आया और यहीं का होकर रह गया। 20 वर्ष की उम्र में मैंने व्यापार के नाम पर यहाँ की हर गली और मोहल्ले में जाकर 25 पैसे में छोले-कुल्चे बेचना शुरू किया। जैसा भी था गुजारा हो जाता था। तकरीबन 36 साल हो गए हैं यहाँ काम करते हुए। खासियत यह है कि स्वाद आज भी वही बरकरार है, यह मैं नहीं लोग कहते हैं। कोई चटपटा खाता कोई सादा। पहले भी पत्ते पर ही छोले लगाता था और आज भी और लोगों को भी यही पसंद है। ऋषिकेश शांत शहर है और यहां के लोग भी। लंबे समय से मैं इस मुखर्जी मार्ग स्थित पीपल के पेड़ के नीचे ही छोले लगाता हूं।

इससे पहले मैं अक्सर हरिद्वार रोड स्थित पंजाब सिंध क्षेत्र स्कूल के बाहर लगाता था। स्कूल में इंटरवेल और छुट्टी होने की जल्दी जितनी मुझे होती उतनी ही बच्चों को भी। बहुत से बच्चे मेरे सामने पढ़े और आज जाॅब पर हैं, मैं तो नहीं पहचान पाता लेकिन वे मुझे याद रखते हैं। मिलने आते हैं और खा कर जाते हैं। आमदनी का क्या है कभी खुशी कभी गम वाला हिसाब है। अपनी मेहनत और लोगों का प्यार है तो ठीक-ठाक कमा लेता हूं, सिर्फ लाॅकडाउन में असर रहा। हाँ काफी लोगों ने सलाह दी कि दुकान लगा दो लेकिन मेरा मन नहीं माना। मुझे लगता है कि दुकान लगाने के बाद अगर मैं अधिक व्यस्त हो गया तो शायद यह स्वाद न दे सकूं। जैसा अब तक चला है आगे भी चलेगा। “जय राम जी की”

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